

अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय आया है कि अनुसूचित जाति की सुविधा और आरक्षण केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लिए लागू है। आशय स्पष्ट है कि अनुसूचित जाति (जैसे महार, मातंग, वाल्मिकी, मेहतर, चंभार, रविदासी इत्यादी) के जिन लोगों ने बौद्ध धर्म अपनाया है वे जाति के कॉलम में अपनी जाति जैसे महार, मातंग, वाल्मिकी, मेहतर, चम्भार, रविदासी इत्यादी और धर्म के कॉलम में “बौद्ध धर्म” अंकित या लिख सकते है। ऐसा करने से उनकी गणना अनुसूचित जाति में भी होगी और तो और वे बौद्ध के रूप में स्थापित होंगे जिससे बौद्धों की जनसंख्या
में वृद्धि होगी. अनुसूचित जाति के लोग बौद्ध धर्मीय के रूप में स्थापित होने से उन्हें अनुसूचित जाति की सुविधा, आरक्षण, विकास निधि में सहभाग मिलेगा ही साथ में बौद्ध धर्मीय के लिए लागू “अल्प संख्यक सुविधा” का भी लाभ मिलेगा।
हमे विदित है कि अनुसूचित जाति,जनजाति के लिए आरक्षण, सामाजिक/आर्थिक/शैक्षणिक विकास न्याय यह डॉ बाबासाहब आंबेडकर की अनमोल देन है। 14 अक्तुबर 1956 को नागपूर की पवित्र दीक्षाभूमी पर डॉ बाबासाहब आंबेडकर ने अन्यायकारी, सामाजिक विषमतावादी हिंदू धर्म का त्याग कर लगभग 5 लाख अनुयायीयो के साथ स्वातंत्र्य, समता, बंधुत्व, अंधश्रद्धामुक्त, वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित बौद्ध धर्म को स्वीकार किया, दीक्षा ली। बाबासाहब से प्रेरणा पाकर यूपी, एमपी, पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, तमिलनाडु समेत अनेक राज्यो में अनुसूचित जाति के लोग/समुदाय ने बौद्ध धम्म को अपनाया। 1980 के बाद मान्यवर कांशीराम, बामसेफ ने आंबेडकरी आंदोलन का विस्तार किया और इसका मुख्य केन्द्र बिंदु यूपी समेत उत्तरी राज्य है।
यूपी जहाँ अनुसूचित जाति की संख्या 5 करोड़ (20%) है मान्यवर कांशीराम की मूवमेंट की सहायता से बसपा की बहन मायावती के नेतृत्व में 3 बार सरकार बनी। इसके अलावा पंजाब, हरियाणा जहाँ अनुसूचित जाति की आबादी 25% तक है और एमपी, राजस्थान, बिहार राज्यो मे (अनुसूचित जाति की आबादी 17-18%) भी कांशीराम मूवमेंट के सहारे बसपा सफलता अर्जित कर पायी है अर्थात आमदार, खासदार निर्वाचित हुए है। मान्यवर कांशीराम और बामसेफ मूवमेंट ने आंबेडकरी विचार जनमानस मे रूजू कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आंबेडकरी विचार से प्रेरणा पाकर अनेक लोग और समुदाय, विशेष तौर पर अनुसूचित जाति के लोग और समुदाय ने सम्पूर्ण भारत मे “बौद्ध धर्म” को अपनाया। इसका प्रमाण आज सम्पूर्ण भारत मे, समस्त राज्यों में निर्मित बौद्ध विहार, बौद्ध सामाजिक भवन अपनी मौजूदगी की साक्ष देते है। परंतु अनुसूचित जाति की सुविधा और आरक्षण आरंभ में केवल हिंदू और सिख धर्मावलंबियों के लिए लागू थी।
अतः अथक परिश्रम से मिला अनुसूचित जाति की सुविधा और आरक्षण अबाधित रखने के लिए मजबूरीवश धर्म हिंदू अंकित करना पड़ा है। हिंदू धर्म का त्याग कर बौद्ध धम्म अपनाने के बावजूद भी शासकीय अभिलेख में हिंदू बने रहे। अब अनुसूचित जाति की सुविधा और आरक्षण बौद्ध धर्म के लिए भी लागू है। अनुसूचित जाति के लोग और समुदाय जिन्होने बौद्ध धर्म स्वीकार किया है अब आदर और सम्मान के साथ आगामी जनगणना में अपनी पहचान बौद्ध धर्मीय के तौर पर कर सकते है। आंबेडकरी आंदोलन, विचार पर आधारित राजकीय, सामाजिक संगठन, वेल्फेयर संगठन, बौद्ध विहार संगठन, भारतीय बौद्ध महासभा इत्यादी ने सक्रिय भूमिका निभाने की आवश्यकता है। महाराष्ट्र के बाहर सम्पूर्ण भारत (विशेष तौर पर यूपी, एमपी समेत उत्तरी राज्यों मे ) लोगों और समुदाय का प्रबोधन करने की नितांत आवश्यकता है। 2011 की जनगणना के अनुसार सम्पूर्ण भारत मे बौद्धों की संख्या केवल 80 लाख (इसमेंसे भी महाराष्ट्र में 70%) है। यह आँकडा आगामी “जनगणना 2027” में 6 करोड़ पार कर सकता है। ऐसा होने पर इसको एक “शांतिपूर्ण धम्म क्रांती” की सज्ञा दे सकते है। इस धम्म क्रांती मे सभी आंबेडकरी संगठन, लोग अपने मतभेद, अहंकार, व्यक्तिगत लाभ/प्रतिष्ठा, प्रतिद्वंदिता भुलाकर/ त्यागकर एकजुटता दिखाएंगे ऐसी उम्मीद और आशा की किरण है।
अनुसूचित जाति के जिन लोगों ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया है उन्होंने जाति के कॉलम में अनुसूचित जाति की सूची/शेडुल में वर्णित जाति जैसे महार, मातंग, वाल्मिकी, मेहतर, चम्भार, रविदासी इत्यादि और धर्म के कॉलम में “बौद्ध” का उल्लेख करने की आवश्यकता है। ऐसा करने पर :
1. अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित आरक्षण, सुविधा, विकास निधि की पात्रता पुर्वव्रत लागू रहेगी
2. बौद्धधर्मीय के रूप में पहचान होगी। बौद्ध धर्मियों के लिए “अल्पसंख्याक विकास सुविधा” लागू है, इसके लिए भी पात्र होंगे। धार्मिक और सामाजिक सुरक्षा मिलेगी।
3. बौद्धों की जनसंख्या में वृद्धि होगी। सम्पूर्ण दुनिया विशेष तौर पर बौद्ध राष्ट्र का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होंगे। बौद्ध राष्ट्रो से भी सुरक्षा कवच मिलेगा। सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक विकास के नए आयाम और अवसर उपलब्ध होंगे।
बौद्ध धम्म की दीक्षा लेने के बाद डॉ बाबासाहब आंबेडकर हिंदू और सिख धर्म की भाँति बौद्ध धर्मियों के लिए भी अनुसूचित जाति के लिए लागू आरक्षण व अन्य लाभ कानूनी तौर पर दिलाने वाले थे। बाबासाहब कहते भी थे कि आरक्षण सुविधाओ की चिंता ना करे यह मेरी जेब में है। बाबासाहब निश्चित ही केंद्र सरकार से अनुसूचित जाति का आरक्षण और सुविधा बौद्ध धर्मियों को भी लागू कराते, इसमें कोई संदेह नही था। किंतु दुर्भाग्यवश
बौद्ध धम्म की दीक्षा लेने के दो महीने के भीतर ही डॉ बाबासाहब आंबेडकर का 06.12.1956 को महापरिनिर्वांण हुआ । बाबासाहब के महानिर्वाण के पश्चात अनेक आंबेडकरी सामाजिक, राजनीतिक संगठनों ने इसके लिए प्रयास किये किंतु काँग्रेस नेतृत्व की हटधर्मिता के कारण कामयाबी नही मिली। 1990 में केंद्र में श्री व्हि पी सिंग के नेतृत्व वाली सरकार सत्तारूढ़ थी, उन्होंने सवैज्ञानिक तौर पर अनुसूचित जाति के लिए लागू आरक्षण सुविधा हिंदू और सिख धर्म के साथ साथ बौद्ध धर्मियों के लिए भी लागू कराया। साथ ही व्हि पी सिंग की सरकार ने ओबीसी के लिए बहुप्रतिक्षित मंडल कमीशन भी लागू किया। 1990 में अनुसूचित जाति का आरक्षण और सुविधाए बौद्ध धर्मीयों के लिए लागू हुई किंतु उसके बाद सरकार, प्रशासन की उदासीनता, असहयोग के कारण क्रियाँवयन में आशातीत सफलता नही मिली।
सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय (अनुसूचित जाति का आरक्षण और सुविधाए केवल हिंदु, सिख और बौद्ध धर्म के लिए लागू है)आने के कारण समस्त भारत मे अनुसूचित जाति के लोग और समुदाय जिन्होने बौद्ध धर्म स्वीकार किया है आगामी जनगणना 2027 में अपना धर्म बौद्ध का उल्लेख कर सकते है, अंकित कर सकते है।
✒️लक्ष्मण बोरकर(मो:-7709318607)







